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वर्ष: 2, अंक 34,  अप्रैल(प्रथम) , 2018



जमा-पूंजी


तुलसी तिवारी


’’ आप मेलन हो नऽ?’’ आवाज सुन कर पल भर को उसकी निगाहें उठीं बोलने वाली की ओर। वह भीड़ से परे खड़ी परसे जाते भोजन को बड़ी हसरत से देख रही थी।

’’ अरे अम्मा!किधर से दरसन दिये ? आओ आओ परसाद गरहन करो!’’ वह बिना कुछ बोले लाइन में बैठ गई थी। लगता था कई दिन की भूखी है। माँ के प्रसाद से तृप्त होकर वह एक खालीकोने में जमीन पर ही ढलंग गई थी। सब को खिला कर जब खली हुई तब मेलन उसके पास पहुँची। ’’ दरसन करने आये हो अम्मा?’’ उसने पैर पड़ते हुए पूछा। वह चुप रही गम़ की परछाइयाँ तैर गईं उसकी आँखों में।

’’या हुआ अम्मा सब कुशल तो है?वह उसे गहरी नजरों से देख कर कुछ समझने की कोशिश कर रही थी।

क्या कुशल कहोगी मेलन! तुम्हारे बाबू जी के जाते ही तीनों बेटे लड़भिड़ कर अलग हो गये,बेटी ने हिस्से के लिए कोर्ट केस कर दिया। मेरे लिए तो कहीं एक बित्ते जगह नहीं बची।सब अपना-अपना हिस्सा बेच कर अपनी-अपनी ससुराल में बस गये।कभी इसक दरवाजे कभी उसके दरवाजे भटक रही हूँ। आँखों से प्रवाहित होती अश्रु धरा को वृद्धा अपने सफेद आँचल से पोंछ रही थी।

म्ेालन अवाक् थी इतनी बड़ी साबुन की फैक्टरी जहाँहजारों लोग काम करते थे,पेट्रोल पंप, दुकान! सब कैसे खत्म हो गया अम्मा? ’’ मेलन के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं थीं।

’’ ज्यादा मत सोचो मेलन! सच बहुत भयानक है।अपसी कलह से सब कुछ खत्म हो गया।उन्हों ने लंबी साँस ली।

’’ अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ अम्मा! त्ुमने एक गरीब लड़की को पढ़ाया था भूल गईं अपनी गुड़िया को? मैं उसी के पास रहती हूँ तुम भी रहोगी हमारे साथ। गुड़िया रतन पुर में तहसीलदार है, उसका पति भी बहुत सज्जन है। मेलन की बातों में दृढ़ता थी।

’’ पर ऐसा कैसे हो सकता है मेलन? हम बेटी के घर पर कैसे रह सकते हैं? वह संकोच से दबी जा रही थी।

पुरानीबाते छोड़ो अम्मा! मैंने तुम्हारी साबुन फैक्टरी में काम करके अपने बच्चे पाले,गुड़िया की ऊँची शिक्षा का भार उठा सकती थी क्या? तुमने उसे पढ़ाई का खर्च दिया। वह हमारी जमा-पुंजी है,संकोच की कोई बात नहीं है । मेलन ने वृ़द्धा के आँसू अपने आँचल से पोंछ दिये।


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