Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 34,  अप्रैल(प्रथम) , 2018



कसम


राजीव कुमार


एक युवक को चोरी के इल्जाम में गांव के कुछ लोग मार रहे थे। युवक चीख-चीखकर कह रहा था, ‘‘हमको मत मारो। मैंने कोई चोरी नहीं की है।’’ लोग मारे ही जा रहे थे। गांव के ही कुछ लोगों ने बीच-बचाव किया। मामला पुलिस तक न पहुंचे और बड़ा ढीट चोर न बने, इसलिए पंचों से सजा दिलवाने का निर्णय लिया।

सरपंच ने उस युवक से पूछा, ‘‘अगर तुमने चोरी नहीं की तो हरिया के घर में क्यों दाखिल हुआ? और हरिया के घर से सामान गायब कैसे हो गया?’’ युवक ने सरपंच के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘हमको कुछ नहीं मालूम, मैं निर्दोष हूं।’’

पंच भी सोच में पड़ गए कि इससे सच कैसे उगलवाया जाए? सरपंच ने एक उपाय निकाला और कहा, ‘‘इसको सब भगवान की कसम खिलाई जाए। चल गणेश भगवान की कसम खा।’’

युवक ने कहा, ‘‘मैं गणेश भगवान की कसम खाता हूं, मैं निर्दोष हूं। मैंने चोरी नहीं की है।’’

रघु ने बिरजू से कहा, ‘‘देखो, कितना झूठ बोल रहा है। गणेश भगवान के पूजन में सबसे आगे यही रहता है।’’

सरपंच ने कहा, ‘‘चल अब शंकर भगवान की कसम खाकर बोल।’’

युवक ने कहा, ‘‘मैं शंकर भगवान की कसम खाकर कहता हूं कि चोरी में मेरा कोई हाथ नहीं है।’’

बिरजू ने अपनी पत्नी से कहा, ‘देखो माधुरी की मां, हर साल बोल बम जाता है और भगवान शंकर की झूठी कसम खा रहा है।’’

सरपंच ने कहा, ‘मैं ये नहीं कहता कि तू झूठ बोल रहा है। मगर तू सच भी नहीं बोल रहा है। चल अब अपनी मां की कसम खा। मगर याद रखना जिस भगवान की झूठी कसम खाएगा, उनके आशीर्वाद से वंचित रह जाएगा और जिस इंसान की झूठी कसम खाएगा उससे तुम्हारा रिश्ता टूट जाएगा।’’

सरपंच की इस बात ने उस युवक के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला। शर्मिंदगी के मारे उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया और सामान लाकर सरपंच के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘माई-बाप, हमको क्षमा कर दीजिए। मैंने ही चोरी जैसा पाप किया था।’’

सरपंच ने कहा, ‘‘तुमने अपनी गलती मान ली, देर आए दुरूस्त आए। तुमको अब कोई सजा नहीं मिलेगी। तुमको सुधरने का एक मौका दिया जाता है।’’ सामने खड़े पुरोहित जी बोल उठे, महापापम, महाभ्रष्टम, घोर कलियुग है। शिव, शिव, शिव। भगवान की झूठी कसम खाता है। नर्क में स्थान नहीं मिलेगा। विधि का विधान है। धर्मग्रंथ साक्षी है। इसको सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इसको दान करना होगा। अखंड करवाना होगा। गांव के सारे ब्राह्मण परिवार को एक साल तक तीनों समय भोजन करवाना होगा।’’

युवक सोच-विचार में है कि क्या अच्छा रहेगा?

फिर जाकर लोगों से मार खा ले या जेल चला जाए या फिर सबका पेट भरे।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें