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वर्ष: 2, अंक 34,  अप्रैल(प्रथम) , 2018



कबाड़ी वाला


राजीव कुमार


सीमा ने जल्दीबाजी में घर का कुछ पुराना सामान कबाड़ी वाले को बेच दिया। कुछ सामान तो पहले से ही पैक था और कुछ को जल्दीबाजी में पैक किया। कबाड़ी वाले के चले जाने के बाद सीमा स्टोर रूम में गई और सजावट का सामान ढूंढ़ने लगी। सारा सजावट का और जरूरी सामान सीमा ने एक थैले में बांधकर रखा था, क्योंकि घर में रंग-रोगन किया गया था। अब तो सीमा को बड़ा झटका लगा क्योंकि जल्दीबाजी में जरूरी सामान एक ही जैसे दो थैले होने के कारण कबाड़ी वाले को दे दिया गया था। अब तो सीमा के होश गुम हो गए। पतिदेव तीन-चार दिन बाद आएंगे तो गुस्सा करेंगे। वर्षों का प्यार बहुत बड़े झगड़े में बदल जाएगा, क्योंकि बहुत कुछ उनकी मां की आखिरी निशानी थी। वो उन सामान को देखकर भावुक हो जाया करते हैं। दो दिन तक बाल्कनी में खड़े-खड़े कबाड़ी वाले का रास्ता देखती रही, मगर वो कबाड़ी वाला दिखा ही नहीं। सीमा मन ही मन कहने लगी, ‘‘कबाड़ी वाले तुमने कितना गलत किया? वो सारे सामान बहुत अनमोल हैं। मगर तुमको क्या मालूम? और तुम्हारी क्या गलती है?’’

सीमा बिस्तर पर लेटे-लेटे बहाना ढूंढ़ने लगी, जिससे कि पतिदेव का गुस्सा शांत हो जाए। उसकी नौकरानी ने आकर बताया, ‘‘मालकिन, वही कबाड़ी वाला आया है। सीमा गुस्से से बिस्तर से उठी और कबाड़ी वाले से बोली, ‘‘अगर मैंने नहीं देखा तो तुमको तो देख लेना चाहिए था कि थैले में क्या सामान है? तुम लोग क्या समझो किसी की भावना को?’’

कबाड़ी वाले की आंखों में आंसू आ गए, थैले से सामान निकालते हुए बोला, ‘‘इस पीतल को बेचकर अच्छा रुपया कमा सकता था, मगर औरत की पेंटिंग देखकर बेचने का मन नहीं किया। इस थैले में प्लास्टिक का जितना भी सामान है सब में मां लिखा हुआ है, जरूर मां की निशानी रही होगी। ये जितनी भी किताबें हैं, सब में देने वाले का नाम और तारीख लिखा हुआ है। इन सामान को भी बेचकर कुछ रुपये मिल जाते। मगर अनमोल निशानी का कोई मोल नहीं है। हम कबाड़ी वालों के अंदर भी भावना है और भावुक होकर लौटाने आया हूं।’’

सीमा बहुत खुश हुई और उसने कबाड़ी वाले की जेब में जबरदस्ती दो हजार रुपये डाल दिए।


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