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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



टूट गई


तुलसी तिवारी


    
आया मधुमास,
बिखरी सुगंध
गूंजी कोयल की कूक
आ रहा चुंबन को ,
झुक रहा मुस्कान लिए ,
प्रीत की पुकार लिए ,
फूलों की सौगात लिए,
एक नये संसार की पुकार लिए,
चरमरा गईं डालियाँ,
शरारती पवन ने ,
जेर से झुलाया हिंडोला,
भर से कराह उठी,
जन की गुहार उठी,
डखड़ न जाये जड़ कहीं,?
होन जाय अंत कहीं?
रात आई आंधी जोर की,
बेदर्द बड़ी दुर्दान्त बड़ी,
बिछ गये कदमों में
पत्त,े फूल, और सरसई टिकोरे,
एक तरफ कुछ खाली था,
बन गया था घाव सा,
भार से तो बच गई
नसूर कैसा बन गया?
जन भले रह गई
शाख एक टूट गई।
   

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