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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



कविता


नारी


सुशील शर्मा


    
नारी तुम स्वतंत्र हो। 
जीवन धन यंत्र हो। 
काल के कपाल पर 
लिखा सुख मन्त्र हो। 

सुरभित बनमाल हो। 
जीवन की ताल हो। 
मधु से सिंचित सी। 
कविता कमाल हो। 

जीवन की छाया हो। 
मोह भरी माया हो। 
हर पल जो साथ रहे। 
प्रेमसिक्त साया हो। 

माता का मान हो। 
पिता का सम्मान हो। 
पति की इज़्ज़त हो 
रिश्तों की शान हो। 

हर युग में पूजित हो। 
पांच दिवस दूषित हो। 
जीवन को अंकुर दे। 
माँ बन कर उर्जित हो। 

घर की मर्यादा हो। 
प्रेम पूर्ण वादा हो। 
प्रेम के  सानिध्य में 
ख़ुशी का इरादा हो। 

रंग भरी होली हो। 
फगुनाई टोली हो। 
प्रेम रस पगी सी 
कोयल की बोली हो। 

मन का अनुबंध हो। 
प्रेम का प्रबंध हो। 
जीवन को परिभाषित 
करता निबंध हो। 
 
   

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