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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



धरती से पलायन


शिबु टुडू



हे ! जन्मदाता
आपका धन्यवाद कैसे दुँ,मैं ?
सुखी संसार को छोड़
आपनेे ऐसे संसार में 
क्यों लाया मुझे ?
जहाँ पर,
शुद्ध नहीं है, हवा
शुद्ध नहीं है, पानी
शुद्ध नहीं है, खाद्य-पदार्थ
जहाँ पर,
नही है, मिठास
मानव की आवाज में,
नहीं है, अच्छे संबंध
मानव, मानव के बीच में
हे ! माता
हे ! पिता
ऐसे धरती से भागना चाहता हु,ँमैं।
हे ! मेरे ममतामयी माँ
हे ! मेरे पुज्यनीय पिता
आप मेरे विनती को सुनें
इस धरती के ऊपर
जहाँ पर,
छोटे से बड़े जीव-जन्तुओं को
क्षण-क्षण में,
पग-पग पर,
आँख की हर झपकी पर,
हर साँस पर,
निराशा हाथ लगती है।
ऐसे धरती के ऊपर
बेशर्म होकर,
क्षण भर भी रूक नहीं सकते,
हे ! माता
हे ! पिता
मेरे विनती को आप सुनें,
इस धरती से सच में,
भागने का मन करता है।
हे !  माता
हे ! पिता
निकल तो चूका हँु, धरती से
मगर,
ब्राह्मण्ड के सभी जीव	
ये छोटी चींटीं भी,
ये ढेमना साँप भी,
ये मेढ़क भी,
ये बुढ़ी गिद्ध भी,
न जाने क्यों 
रूख करते नजर आ रहे हैं,
धरती की ओर ?
हे ! माता
हे ! पिता
फिर भी आप मुझे क्षमा करें,
मैं अकेला ही,
इस धरती से भागना चाहता हुँ।
 
 

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