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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



हे पुरुष तुम नारी के कब होगे आभारी


अर्विना गहलोत


ये आधी आबादी पूरी आबादी की जननी है,
फिर भी तुम ने खुद बंटवारे की दीवारें खड़ी कर डाली,
सच कहना सच सुनना नहीं चाहते,
अखबारों के पन्नों पर तारीफों के पुल बांधे है,
घर की नारी आज के दिन भी तेरी झिड़की के बोझ की मारी,
हे पुरुष तुम नारी के कब होगे आभारी।

नारी श्रम को कमतर मत  आंकों खुद से,
घर आफिस का दोहरा बोझ उठाती है,
उस पर भी कभी पीटी तो कभी गालियों से नवाजी जाती है,
चुप रह सहनशीलता का पाठ पढ़ाती है,
घर स्वर्ग रहे इसी प्रयत्न में खुद को खपाती है,
हे पुरुष तुम नारी के कब होगे आभारी।

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