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वर्ष: 2, अंक 34,  अप्रैल(प्रथम) , 2018



कृष्ण


हर्ष कुमार सेठ


ऑफिस के फोन की घंटी बजी फोन मेरी टेबल पर ही था, मैनें फोन उठाया तो दूसरी तरफ से मेरी पत्नी बोली तुम्हारा मोबाइल नही लग रहा था इसलिए इस पर करना पड़ा। मैनें कहा हॉ बोलो वह बोली सुबह दुध वाले को कुछ रूपये देने थे तो दो हजार का नोट टेबल पर ही रख दिया था और ऊपर से उस पर टी.वी. का रिमोट रख दिया था। दूध वाला नही आया और अभी तक घर में कोई और भी नही आया पर वो नोट नही मिल रहा है। रिमोट वही पर रखा है क्या तुमने वह रूपये लिये मैंने कहा नही बस इतना कहना था कि वह तेज-तेज बोलने लगी। जरूर यह नोट पप्पू ने ले लिया, पप्पू हमारा लड़का था पर वह तेज-तेज बोलती रही पप्पू की इतनी हिम्मत कि वह घर में चोरी करने लगा। उसका तो भविष्य खराब हो गया अब यह जिन्दगी में कुछ नही बन पाएगा। कल रात को तुमसे रूपये मांग रहा था कह रहा था उसे बहुत जरूरत है कैसी जरूरत और फिर घर में चोरी, यह सुनकर न जाने मुझे क्या हुआ और रिसीवर रख दिया और ख्यालों में चला गया........................

मैं और कृष्ण पहली कक्षा से साथ में पढ़ते थे। पांचवीं तक हमारा स्कूल छोटा था और बाद में हम दूसरे स्कूल यानी बड़े स्कूल में आ गये थे, पर तब भी हम एक ही क्लास में पढ़ते थे। गर्मियों की छुट्ट‍ियों में कभी वह मेरे घर कभी मैं उसके घर पर जाता। सारा दिन हम एक-दूसरे के घर पर रहा करते, उसके घर पर उसके मामा-मामी व उनका बेटा था जो एक-दो साल पहले नौकरी पर लगा था। गर्मियों की दोपहर में उसके घर में कोई नही होता था और उसका घर खाली होता था तो मैं उसके घर चला जाता था। यह उसके मामा-मामी का घर था क्योंकि उसके माता-पिता का देहान्त हो चुका था और वह उसे गांव से शहर ले आये थे। कृष्ण बहुत सीधा व नेक लड़का था। पर उसके मन में कुछ न कुछ गम ज़रूर था जो वह हमेशा छुपाता था।

धीरे-धीरे हम कक्षा दस में आ गये। उसके भाई यानि मामा के लड़के की शादी भी हो गयी। आज कृष्ण और मेरा दसवीं कक्षा का रिजल्ट आना था। शाम 4:00 बजे मैं कृष्ण के घर पर गया और दरवाजे को खटखटाया अन्दर से उसकी भाभी आयी शायद वो तैयार हो रही थी। वह कुछ अस्त-व्यस्त थी शायद वह नहा रही थी। बाहर आकर उसने थोड़ा सा दरवाजे खोलकर हंसते हुये कहा आ गये तुम, लेकिन मुझे देखकर वह डर गई और बोली हॉ बोलो क्या काम है, मैनें पूछा कृष्ण है वह बोली नही और दरवाजा बन्द कर दिया।

दसवीं का रिजल्ट आ गया। कृष्ण भी पास हो गया और मैं भी। मैं बहुत खुश था परन्तु कृष्ण नज़र नही आ रहा था। पहले मैनें सोचा क्यों न कृष्ण के घर पर चलकर उसका हालचाल पूछा जायें पर उसकी भाभी के बारे में सोचकर मैनें निर्णय लिया कि अभी नही।

जब कभी मैं और कृष्ण एक-दूसरे के घर पर नही जा पाते थे तो मेरे घर के पास पार्क की रेलिंग पर एक-दूसरे के इन्तजार करते थे। हम घंटो बैठे रहते कि शायद हम दोनों में से दूसरा यहां पर मिलने के लिए जरूर आयेगा, यह पार्क आधा किलोमीटर दूर था मेरे घर से।

अब मैं कृष्ण के इन्तजार में रोज़ रेलिंग पर बैठने लगा और उसका इन्तजार करने लगा। तभी मैनें कृष्ण को उधर आते देखा कृष्ण, हे कृष्ण यार कहाँ था तू तेरे बिना मन ही नही लगता, मैं कहे जा रहा था और वह उदास सा दिखाई दे रहा था, मैने पूछा यार क्या हुआ और उदास क्यो हैं। वह बोला यार मुझे पता ही नही चला कि मैं बड़ा हो गया हूं। क्या मतलब क्या कह रहा है तू मैने बोला, हॉ मैं सच कहा रहा हूं मामा-मामी कह रहे हैं कि अब मैं बड़ा हो गया हूं। अब मुझे वह घर पर नही रखेंगे अब मेरे दोस्त भी बड़े हो गये है। क्या मैं आवाक सा रह गया।इसका मतलब मैं भी बड़ा हो गया मैं बोला, हॉ तू भी वह बोला। शायद मैं वाकई बड़ा हो गया था, मैं समझ गया कि उस दिन मुझे शाम को कृष्ण के घर पर नही जाना चाहिए था। मेरा मन बहुत दु:खी हुआ पर मैं कृष्ण का दोस्त हूं सच्चा दोस्त।

कृष्ण ने आगे कहा यार मुझे एक वकील के पास कनॉट प्लेस में ही रहना है और मैं कल भी वहां था। रात दस बजे ऑफिस के सभी दरवाजे बन्द हो जाते है और उससे पहले मुझे वहां पहुंचना होता है नही तो मुझे ऑफिस के बाहर ही सोना होगा। सुबह नौ बजे से सात बजे तक ऑफिस फिर दो-तीन घंटे की छुट्टी व रात को दस बजे से पहले ऑफिस में पहुंचना व अकेले वहां सोना इसके बदले में प्राईवेट पढ़ाई का खर्चा व खाना यह सब मिलेगा।

कृष्ण ये क्या कहा रहा है तू मैं बहुत घबरा सा गया तू इतना बड़ा भी नही हुआ है यार, मामा-मामी ऐसा नही कर सकते। कृष्ण ने कहा अब वह मुझे नही रख सकते, मामा ने यह भी बहुत मुश्किल से करवाया है वरना मुझे कौन रखेगा। यार कृष्ण तू क्या कहा रहा है मैं कुछ समझ नही पा रहा हूं। कृष्ण बोला हॉ यार अब मैं रोज-रोज तुझसे नही मिल सकता शायद यह मुलाकात आखि‍री मुलाकात हो पर दोस्त आज मुझे तुमसे कुछ सहायता चाहिए, मैने बोला-बोल मैं क्या कर सकता हूं तेरे लिए वह बोला यार मेरे पास एक रूपया है और कनॉट प्लेस की बस का किराया भी एक रूपया है। मैं ऑफिस तो पहुंच जाऊंगा लेकिन कहीं मुझे आने-जाने के लिए और कभी खाना नही मिला तो उसके लिए रूपये चाहिए, क्या मुझे तुम पचास रूपये घर से लाकर दे सकता है। यह रूपये भी मैं काम करके लौटा दूंगा पर दो-तीन बार में। मैनें कहा हॉ कृष्ण मैं ले आता हूं तू यही मेरा इन्तजार करना। कृष्ण बोला-आखि‍री बस साढ़े नौ बजे की है दोस्त तू नही आया तो मैं वह बस छोड़ नही पाऊंगा। मैनें कुछ खाया भी नही है पर इस समय रूपये मेरे लिए ज्यादा ज़रूरी है।

अभी सात बजे थे मैंने उससे बोला ठीक है तू रेलिंग पर मेरा इन्तजार कर और मैं घर भाग-भागकर पहुंच गया, माँ को मैनें सब-कुछ बता दिया पर माँ के पास पैसे नही थे फिर मैनें पिताजी से रूपये मांगें और उनको अलग-अलग कहानी भी सुनाई पर वह मना करके दूसरे कमरे में चले गये और माँ खाना बनाने चली गयी। अब तो नौ भी बज चुके थे।

मुझे कुछ समझ नही आ रहा था कि पचास रूपये कहां से लिये जायें, मेरा यार मेरा दोस्त मेरा इन्तजार कर रहा था और दूसरी तरफ मेरे मां-बाप मेरी बात को समझ नही पा रहे थे आखि‍र मैनें अपने पिताजी की जेब से पचास रूपये चुरा लिये और भागा कृष्ण को देने के लिए शायद अब देर हो चुकी थी अब तक दस बज चुके थे। कृष्ण ने वह आखि‍री बस पकड़ ली अगले पांच से छः साल तक मैं घंटों रेलिंग पर बैठकर कृष्ण का इन्तजार करता रहा पर कृष्ण नही आया। मेरा दोस्त चला गया, क्या सही हुआ क्या गलत मुझे कुछ नही मालूम पर कृष्ण को मैं हमेशा याद करता रहा। मेरी आंखों से आंसू आ रहे थे और मैं अपने केबिन में बैठा रो रहा था। मैनें अपना पर्स खोला, देखा आज भी वह पचास रूपये का नोट जिस पर मैने पे‍न्स‍िल से कृष्ण लिख दिया था मेरे पास है यह उसकी अमानत थी और मेरे सच्ची दोस्ती।

पापा ने कई बार कहा जिसने भी मेरे रूपये निकाले है वह हैवान है वह कभी भी जिन्दगी में बड़ा आदमी नही बन सकता वह शैतान है। मैं आज एक बहुत बड़ा आदमी था गाड़ी, नौकर-चाकर सब-कुछ था मेरे पास बस सिर्फ नही था वो मेरा दोस्त कृष्ण।

आज पत्नी की बात सुनकर मुझे कोई आश्चर्य नही हुआ। सत्यता को जाने बिना कल्पना से निर्णय लेना और बिना यर्थाथ को जाने अपनों को गलत समझना, अच्छे से अच्छे व्यक्ति‍ को अपमानित कर सकता है। अपनों के लिए हृदय नही ज्ञान की संजीवनी की ज़रूरत है। कृष्ण तो अब कभी नही आयेगा पर वह मुझे क्या दे गया। शायद यह किसी को कभी समझ ना आये।


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