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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



गीत


औरों के गुण ढूँढ रहा है


सुनीता काम्बोज


    
औरों के गुण ढूँढ रहा है, खुद की है पहचान नहीं 
मन में उसे झाँकने देता ,उसका ही अभिमान नहीं 

अपनी कमियों को अक्सर वो ,अनदेखा ही करता है 
कैसे करे सामना उनका ,शायद उनसे डरता है 
रिक्त कलश लेकर फिरता है , निशदिन तट पर आ जाता 
ललित स्वप्न में खोया रहता ,जल में नहीं उतरता है
सादर की गहराई का भी ,है उसको कुछ ज्ञान नहीं 
मन में उसे-----

जिस दर्पण के आगे बैठा ,उस दर्पण पर धूल जमीं 
कलुष हुआ है हर इक कोना , अंतर्मन पर धूल जमीं 
आँखे बंद रौशनी ढूँढें, समझ नहीं वो पाएगा 	
चमक पड़ी है फीकी –फीकी इस कुन्दन पर धूल जमीं
मन के ऊपर जमीं परत को ,पिंघलाना आसान नहीं 
मन में उसे----

जीवन की हर सच्चाई सब ,कर पाते स्वीकार नहीं 
अवगुण कैसे देख सकोगे , ये मन है तैयार नहीं 
कुछ विरले ही होते हैं जो , मृग मन को समझा पाते 
भव में डूब गए कितने ही ,सब जाते उस पार नहीं 
अमृत की चाहत है सबको , करना है विषपान नहीं 
मन में उसे---
   

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