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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



यह काया तो जानी है


डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा "अरुण


    
यह काया तो जानी है।
सिर्फ  रूह लासानी है।

उस घर की तू सोच जरा,
जहाँ  तेरी  अगवानी है।

तू तो जाने क्या क्या जोड़े,
दुनिया ये बहता पानी है।

ऊपर वाले को याद तो कर,
केवल वो ही लासानी है।

मन माने या कुछ ना माने,
लेकिन यह बात पुरानी है।

जाना तो होगा दुनिया से,
'अरुण' ये रीत निभानी है।

   

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