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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



मेरी परछाई


सुभाष पाठक 'ज़िया'


    
आज  मुझसे  दूर ऐसे  मेरी  परछाई हुई,
आँसुओ को तरसे जैसे आँख पथराई हुई।

हो न हो कुछ तो कहा है बादलों ने चाँद से,
देखिये तो चाँदनी है कितनी घबराई  हुई।

ख़ाक वो हमसे कहेंगे दास्तान ए ज़िन्दगी,
कह न पाये जो कहानी होंठ पे आई हुई।

हाय उसने किस अदा से लुत्फ़ छीना है मेरा,
हाथ में दे दी है अपनी ज़ुल्फ़ सुलझाई हुई।

एक दिन फ़ुरसत में तनहाई से मैंने बात की,
तब कहीं जाकर मेरी मुझसे शनासाई  हुई।

   

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