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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



काश


सुभाष पाठक 'ज़िया'


    
काश तू बाम पे आया होता,
मेरे दरवाज़े पे  साया होता।

लाल पीले में मिलाया होता,
इक नया रंग बनाया  होता।

रंग फूलों का न पड़ता फ़ीका,
गर न तितली को उड़ाया होता।

सो गया था मेरा ग़म मेरे साथ,
तुमने मुझको न उठाया  होता।

क्या जलाता तू बुझाता क्या वो,
गर  दिया ही न बनाया  होता।

लज़्ज़त ए दर्द बनी रहती 'ज़िया'
काश मैं चीख़ न पाया  होता।
   

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