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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



जवानी का ज़माना


प्राण शर्मा


    
रूठना और फिर मनाना ख़ूब था 
वो जवानी का ज़माना ख़ूब था 

तेरा भी वो पास आना ख़ूब था 
मेरा भी तुझको बुलाना ख़ूब था 

गूँजी थी कुल्लू की घाटी में सदा 
तेरा - मेरा खिलखिलाना ख़ूब था 

क्यों न करता मस्तियाँ ही मस्तियाँ 
ज़िंदगी का दिल को भाना ख़ूब था 

काँटे भी हमको लगे थे फूल से 
वो समय का रास आना ख़ूब था 

चलते थे फिर रुकते थे फिर चलते थे 
घाटी में चलना - चलाना ख़ूब था 

क्यों न होता हम पे भी उनका असर 
झूम कर मेघों का छाना  ख़ूब था

चल पड़े तो मुड़ के फिर देखा नहीं 
जो भी हमने `प्राण`ठाना ख़ूब था 
 

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