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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



ग़रूर पाल नहीं


प्राण शर्मा


    
औरों सा गर तू मालामाल नहीं 
आस दिल से कोई निकाल नहीं 

एक सा हर महीना , साल नहीं 
एक सी मौसमों की चाल नहीं 

तेरी अपनी ही देखभाल नहीं 
गुस्सा औलाद पर निकाल नहीं 

इक यही तो है उसकी साख मियां 
पगड़ी मजदूर की उछाल नहीं 

कौन है दोस्त , है सवाल मेरा 
कौन दुश्मन है , ये सवाल नहीं 

काश , हमदर्द भी कोई होता 
दोस्तों का यहाँ अकाल नहीं 

यूँ तो खाते हैं सब नमक यारो 
हर कोई पर नमक हलाल नहीं 

हर किसीकी यही शिकायत है 
जैसा पहले था वैसा हाल नहीं 

जी भले ही उठा के सिर अपना 
`प्राण` लेकिन ग़रूर पाल नहीं 
 

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