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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



सुहाया न ज़िंदगी भर


नरेन्द्र श्रीवास्तव



सुहाया ज़िंदगी भर हमें जो नहीं।
अँखियाँ उसी की ख़ाक ले रो गईं।।

ख्वाब उजले स्वर्ग के हम देखते रहे।
झोपड़ियाँ  नींद  बन कर  सो गईं।।

सजते - सँवरते रहे यूँ तो रात भर।
रश्मियाँ सूरज  की  सुबह धो गईं।।

कल की प्रतीक्षा करते रहे उम्र भर।
घड़ियाँ आज की ही लंबी हो गईं।।

वहाँ प्रार्थना करते रहे मंदिरों में जा।
यहाँ  मूर्तियाँ घर  की कहीं खो गईं।।

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