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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



दो गज जमी मिलेगी दफनाने के लिए


जयशंकर प्रसाद डनसेना


लड़ता रहा मैं गांव को बचाने के लिए,
तो भी आ गए मेरा घर जलाने के लिए।

शाख पे गुल हरदम नहीं रहता यारो, 
पैदा हुए हैं हम यहां मर जाने के लिए।

नजर अंदाज करोगे मुझको कब तक,
तुम भी चाहते हो हाथ मिलाने के लिए। 

सारी धरती पे हुकूमत हो जाएगी लेकिन,
जमी दो गज ही मिलेगी दफनाने के लिए।

जमीन तो धरती की है छोड़ जाएंगे सभी,
बचे हैं दो रोज अब तो जाने के लिए ।

गुरूर मत कर इतना जांविदां तो नहीं,
ले चलेंगे तुझे भी लहद में सुलाने के लिए।

कुछ दिनों बाद तुझे भूल जाएंगे ‘प्रसाद’
रहेगी ये तहरीर मुझे याद दिलाने के लिए । 

 

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