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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

हँसी वो ख़्वाब के धोखे में .....

सुशील यादव दुर्ग

हुनर का फूलता-फलता सा दरख्त बेच आया हँसी वो ख़्वाब के धोखे में नीयत बेच आया फिरा रोटी जुगाड़ में आदमी दर ब दर सहमा गमो की एक ही बारिश असलियत बेच आया किसी से बात कहने की अजब घबराहटो में नहीं जाना कहाँ आखिर शराफत बेच आया टके-दो में, जहां सारा खरीद लिया हो सपने वही अपना वजूद कहीं हकीकत बेच आया मुसीबत का पहाड़ नहीं था उसके सामने कुछ हुआ क्या जो सलीका आज हिम्मत बेच आया


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