मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

रफ्ता-रफ्ता दूर मुझसे हर कोई होता गया

सविता चड्ढा

आंधियों का दौर था तूफान भी पलता रहा, इक दीया फिर भी फिज़ाओं में कहीं जलता रहा । मेरी धुन के सामने ठहरा न आखिर वक्त भी, हादसों की शक्ल में आता रहा टलता रहा । सारा जीवन बिन किए कुछ जिसने अपना खो दिया, उम्र भर वो शख्एस अपने हाथ ही मलता रहा । हम ही थककर चूर हो बैठे, गिला किससे करें, कारवाँने ज़िंदगी चलता रहा चलता रहा । रफ्ता-रफ्ता दूर मुझसे हर कोई होता गया, कतरा-कतरा आस का सूरज मेरा ढलता रहा । हमने माना वक्त भी छलिया है लेकिन देखिये, आदमी को आदमी ही आजतक छलता रहा । बेल सच की हर जगह कटती रही 'सविता' मगर, झूठ का पौधा जहाँ में फूलता फलता रहा ।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें