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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

परिंदा

जयति जैन "नूतन"

कुछ लिखूं ना लिखूं अपने हालात लिखूगीं किसी से ना कह सकी वो हर बात लिखूगीं । तुम्हें पाने के लिए गुनाह किये हैं बार बार गुनाहों में दबी तुम्हें पाने की इबादत लिखूगीं । तुमसे बार बार मिलने की कोशिशें जारी रखीं तुमसे ना मिल पाने के वो ख्यालात लिखूगीं । रोये बहुत थे एक तेरे रूठ के जाने से उस रोज इंतेजार में गुजारे एक एक दिन रात लिखूगीं । पलकें नम भले हों पर लिख लेती हूं अल्फाज़ दिल की गहराइयों में उतरे वो जज्बात लिखूगीं । हमसे ना पूछों कब चांद मिलता है चांदनी से मैं जल मर जाने वाले पतंगे की बात लिखूगीं । तुम देख सको तो देखो उसे मेरी निगाह से यादों का उफनता समुंदर है मैं याद लिखूगीं । कोई कुछ भी कहता रहे मुझे फर्क नहीं पड़ता वो उड़ चुका परिंदा है उसे मैं आजाद लिखूगीं ।


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