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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

मुसीबत को झेल तो सकता है

जयशंकर प्रसाद तमनार

बोल नहीं सकता मगर तौल तो सकता है, गुस्सा भीतर ही भीतर खौल तो सकता है । दिखता है गुमसुम खामोश गमजदा सा मगर, इंकलाबी सोच का जहर वो घोल तो सकता है। जमीं की ताकत का एहसास तुम्हें अभी नहीं जलजला से, बिन हवा डाली डोल तो सकता है। हिन्दु मुस्लिम की बातों में उलझा के रखेगा हमें, ये खेल सारा सियासी खेल तो सकता है । छिपा के रख अपनी जिंदगी की राज को अपना कोई महफिल में खोल तो सकता है। गुरबत की दुनियां हम अमीरों से तो अच्छा है। प्रसाद वो हर मुसीबत को झेल तो सकता है।


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