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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

फिक्र जमीं के लिए है कि नहीं है

जयशंकर प्रसाद डनसेना

ये जो धुआँ है फजा में धुआं है कि नहीं है, ऐ दोस्त ये जहरीली हवा है कि नहीं है । सोचता हूं किस तरह से मैं सांस लूं यहां, इस जगह पे अब वादे सबा है कि नहीं है। हर सांस में लफजों में गरदा है कि नहीं है, ये हमारी ही करतूतों की सजा है कि नहीं है। जमीं की खूबसूरती को जरा गौर से देखो, इस जमीं में हर तरफ खुदा है कि नहीं है। हमारी हर शय के लिए फिक्रोमंद है धरती, इस जमीं के लिए हमें फिक्र जरा है कि नहीं है। हमारी सितम से ये जमी खत्म न हो जाय, आज तक इसे कोई समझा है कि नहीं है।


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