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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

जीत हार

इंदर भोले नाथ

चाहे जीते कोई या हारे कोई पर बिगड़ी हालात को सुधारे कोई जो दुर्दशा है आज इस उजड़े चमन की गुलिस्ताँ वतन का संवारे कोई कब तक लड़ोगे जाति-मज़हब के नाम पर हम इंसानो को कभी इंसान पुकारे कोई नहीं माँगता "इंदर" तुमसे मुकम्मल जहाँ क़तरा-क़तरा सही वतन को निखारे कोई चाहे जीते कोई या हारे कोई पर बिगड़ी हालत को सुधारे कोई


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