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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

खुद पर हंसी आ ही जाती है

डॉ० अनिल चड्डा

उदासी जब हद से बढ़ती जाती है, तो खुद पर हंसी आ ही जाती है। कुछ मांगो, कुछ और दे गर जिंदगी, शिकायत जिंदगी से हो ही जाती है। कई करार किये, कई समझौते किये, जिंदगी फिर भी दुश्वार हो ही जाती है। हर चाल में था उनकी इक नया पैंतरा, अपना खेल जिंदगी खेल ही जाती है। जिंदगी से हमने किया तो था करार, मौत हर करार को तोड़ ही जाती है।


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