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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

रौशनी तो बिखर के छाती है

अब्बास अल्वि

रौशनी तो बिखर के छाती है क्यों अँधेरा नज़र नहीं आता आरज़ू हमको जिस सवेरे की वह सवेरा नज़र नहीं आता जन्म से बँट रहे हैं धर्मों में एक मालिक नज़र नहीं आता बम हैं बग़लों में छल निगाहों में हाथ में अब क़लम नहीं आता भूखे पेटों की ख़ुश्क बस्ती में कोई त्यौहार अब नहीं आता यूँ तो दुनिया में हंसी लाखों हैं कोई तुझसा नज़र नहीं आता अपनी आँखों को क्या हुआ ऐ रज़ा अब तो अपना नज़र नहीं आता


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