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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

भूत

सुरेश सौरभ

कई बाजो के बीच में फंसी वह निरीह चिड़िया छटपटा रही थी। फड़फड़ा रही थी। बहुत देर से बाज उसे लुटा रहे थे , उठा रहे थे, नोंच रहे थे , खसोट रहे थे। बड़ी मुश्किल से जब वह छूटी, तो सारे बाज खींसे निपोर कर बाोले -बुरा न मानो भाभी! होली है, देवरो की टोली है। पानी रंग से सराबोर वह चिडियॉ तब कातर स्वर में बोली-तुम्हारी भी बहनें किसी की भाभी हैं किसी की साली हैं, जो तुमने मेरे साथ किया वही उनके साथ होगा , यह एक अबला की बद्दुआ है। यह सुनकर सारे बाजो का मुंह लटक गया । वे शून्य में कुछ खोजने लगे। और उन पर चढ़ा होली का भूत उतरने लगा।


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