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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

बहु-परीक्षा

राजीव कुमार

संतराम सिंह सीधे-साधे व्यक्तित्व के धनी थे। हमेशा सादगी से प्यार और सरोकार। राम भक्त, संतनाम सिंह के लिए पुजा-पाथ दैनिक और आवश्यक दिनचर्या में शामिल था। कोई ऐसा दिन नहीं था कि बिना भगवान को भोग लगाए कुछ भी खाया हो। उनके बड़े बेटे के विवाह की बात चली तो एक करीबी रिस्तेदार ने जान-पहचान की दो चचेरी बहनों को संतराम सिंह के घर पहुंचा दिया। संतराम सिंह की पत्नी सुंधा ने बहुत एहतियात से दोनों लड़कियोें को रखा, कहीं उंच-नीच हो जाती तो अच्छा नहीं होता।

संतराम सिंह और उनकी पत्नी खुश थे कि दोनों लड़कियां अति सुंदर है। पुछने पर पता चला कि दोनों गृह-कार्य में दक्ष है। संतराम सिंह ने अपनी पत्नी सुधा से कहा ’’ दोनों लड़की तो एक से बढ़कर एक सुंदर है। खाना भी बहुत अच्छा बना कर खिलाया। कोई लड़की काटने लायक नहीं है। अब क्या करें? ’’

’’ छोटा बेटा का भी साथ में विवाह कर देंगें।’’ सुधा ने अपने पति की ठाली में रोटी डालते हुए कहा।

दोनो चचेरी बहन काव्या और भव्या आपस में अच्छी सहेलियां भी थीं। शनिवार का दिन था, दोनों खाना खा चुकने के बाद अपने कमरे में अपने विस्तर पर चली गई। टेलीविजन पर ’ जय हनुमान ’ धारावाहिक दे रहा था। जय हनुमान धारावाहिक देखने में दोनों बहनों ने कोई अभिरूचि नहीं दिखाई। जय हनुमान धारावाहिक खत्म होने के बाद फिल्म देखने के लिए दोनों बहनें बरामदे में आ गई। संतराम सिंह को बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपनी पत्नी सुधा से कहा ’’ मैं कहना चाहता हुं कि अपना परिवार का हर सदस्य पुजा-पाथ में बहुत रूची रखता है। बिना पुजा-पाथ किए हुए कोई अन्न ग्रहण नहीं करता, और ये दोनों लड़की ’ जय हनुमान ’ भगवान का धारावाहिक शुरू हुआ तो सोने चली गई और जब फिल्म शुरू हुआ तो देखने चली आई। लगता है कि इनके घर में भक्ति की भावना नहीं है। नहीं चाहिए ऐसी बहुएं। सुधा ने समझाने की भरपुर कोशिश की लेकिन संतराम सिंह के सामने उनकी एक न चली। भगवान जाने उनके विचारों के अनुरूप उनको बहु मिली कि नहीं?


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