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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

मन का मैल

डॉली अग्रवाल

शीतल काम से फ्री होकर कमरे में पहुँची ही थी कि फोन बज उठा ! नरेंद्र बुरा सा मुँह बना उठे !

हैल्लो , शीतल ने बोला तो उधर से आवाज आई -- मोटी कैसी है ! शादी के बाद भूल गयी !

शीतल खुशी से लगभग चिल्ला कर बोली -- भाई कैसे हो !

कल ही वापस आया और आज तुझे फोन ! मिया जी कैसे है ? फ़ोटो देखी -- ठीक ठाक देखने में ! बस थोड़ा सा नाटा है -- ये कह धीरज हँस दिया !

भाई चुप करो , तुम मिलो उनसे नरेंद्र बहुत अच्छे है !

चल फिर बात करता हु खुश रह !

फोन रख वापस आई तो नरेंद्र उखड़े थे ! किसका फोन था ?

भाई का !

सुबह ही तो दोनों भाई मिल कर गए अब कौन सा भाई आ गया !

आप मिले नही उनसे वो सुनील (छोटे भाई ) का दोस्त धीरज है ना उसका फोन था ! वो दुबई काम करता है कल ही वापस आया ! बचपन साथ ही बीता , दोस्त के साथ भाई भी मेरा !

बस रहने दो जो ये धर्म भाई होते है ना जानता हूं अच्छे से ! दुसरो के सामने भाई और पीछे ?

चुप करो , शीतल चिल्ला उठी ! ऐसा कैसे सोच सकते हो ! रोती हुई शीतल सोचने पर मजबूर थी कैसे ज़िंदगी कटेगी नरेंद्र के साथ !

अगले दिन घर में शोर की आवाज सुन शीतल जैसे ही नीचे आई , एक खूबसूरत सी लड़की नरेंद्र से लड़ रही थी कि बिना उसे बताये कैसे उसने शादी की ! सासू माँ भी मुस्कुरा रही थी ! मुझे देख सब चुप हो गए ! माँ बोली रजनी ये है शीतल नरेंद्र की पत्नी ओर तेरी भाभी ! रजनी मुझे देख मुस्कुराई ओर बोली बहुत प्यारी है , लेकिन भाभी नही दोस्त ! नरेंद्र भी तो दोस्त है मेरा !

नरेंद्र पास आये और बोले राघव की बहन है ! राघव सबसे अच्छा दोस्त नरेंद्र का ओर वो उसकी बहन ! शीतल को नरेंद्र की मानसिकता का आभास हो ही गया था -- झट से बोली बहन जैसी है ये आपकी पर बहन नही !

नरेंद्र नजरे झुकाये पैरो से कार्पेट को रौदने लगा !


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