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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

प्राइस टेग

दिलीप भाटिया

कला से जीवन भर का रिश्ता जोड़ने के उद्देश्य से कैलाश सपरिवार साक्षात्कार के लिए आया था। तिलक दहेज की वही रुकावटें एवं नकारात्मक विचार। अगले दिन कैलाश को वाट्सएप पर कला का मैसेज मिला ---- तुम कल 5 लाख का प्राइस टेग लगाकर आए। मैं स्वयं शिक्षका। पापा को कष्ट नहीं होगा। स्वयं तुम्हें खरीद सकती हूँ। तुम स्वयं आत्मनिर्भर। क्यों अहसान ले रहे हो ? अनमोल हो तुम। शिक्षित भी हो ही। कुछ महीनों की बचत से इतना जोड़ने में सक्षम हो। विचार करना। तुम्हारे निर्णय के बाद ही अपना निर्णय सूचित करूँगी। कैलाश ने विचार कर उत्तर दिया ---- मुझे एक नई राह दिखाने के लिए धन्यवाद। मैनें अपना प्राइस टेग हटा दिया है। कला का उत्तर ------ प्रिय जीवन साथी , कला अब कैलाश की ही है।


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