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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

शब्द बाण

विनोद महर्षि 'अप्रिय'

कमीना कहीं का , तेरे जैसा पैदा हो गया कुल का नाम डुबो दिया । गुर्राते हुए बाप ने जवान बेटे को भला बुरा सुनाया तो माँ ने कहा 'जाने भी दीजिये अब इसमें इसकी क्या गलती है । कभी कभी पैरो तले जमीन खराब आ जाती है। बस कीजिये अब आप खाना खा लीजिये'।

निराश मन से राजू अपने कमरे की तरफ चला गया। जहां ताव में आई हुई रणचंडी की तरह एक और व्यक्तित्व ताने सुनाने को तैयार बैठा था । वो थी राजू की पत्नी सविता ।

आ गए क्या महाराज चले राजा प्रजा की सेवा करने। सब कुछ बेच दिया , जमीन , गहने अब मुझे बेचने का इरादा है क्या ? गर्दन झुकाए हुए ही राजू ने कहा 'खाना खिला दो।‘

‘खा लो खुद लेकर रसोई में कुछ मिलता है तो ।‘ आवेश स्वर में सविता बोली ।

‘मेरे कर्म फूटे जो तुम्हारे पीछे आई ।‘

राजू ना नजर उठा सका और ना रसोई में जाकर खाना खा सका । रोज रोज के इन तानो से वो बहुत परेशान हो गया । सोने लगा तो फिर से परमाणु बम की तरह सविता की आवाज गूंजी 'मुझे नींद नही आएगी ऐसे बेकार और नालायक इंसान के पास , हे राम मेरा जीना बेकार हो गया । मेरे बाप ने किसके पल्ले बांध दिया मुझे ।‘

राजू ने चादर उठाई और बाहर निकला तो ठिठक गया। बाहर पिताजी हैं। उधर गया तो फिर सुननी पड़ेगी। चुपके से राजू छत पर चल गया और चादर बिछाकर दीवार का सहारा लेकर सोने की कोशिश करने लगा ।

आंखों में नींद नही थी ना दिल मे सुकून था । पिताजी के ताने तो फिर भी बर्दाश्त हो जाते पर पत्नी के ताने कैसे बर्दास्त करे। जिसने सात फेरों के वक़्त साथ चलने की हर सुख दुख में साथ निभाने की कसम खाई उसने ही आज कमरे से बाहर निकाल दिया। राजू अंदर तक तड़प उठा । सोचा कि इससे तो अच्छा है कि मर जाऊं, छत से कूदने के लिए राजू उठा और मंडेर तक आकर रुक गया । उसके दिमाग में कोई सकारात्मक शक्ति प्रवेश कर चुकी थी। राजू ने सोचा जरा सी गलती पर पिताजी बचपन मे भी पीट देते थे तो अब तो मेने ने सच मे घर का बहुत नुकसान करवा दिया है तो पिताजी का नाराज होना और ताने मारना जायज है लेकिन सविता ने ऐसा कहा !वो सविता जो हर पल मेरे लिए जीती थी आज मुझसे विरक्त कैसे हो गई।

राजू वापिस चदर पर आकर बैठ गया और सोचने लगा कि जब तक मेरे पास पैसे थे काम था तब तक सविता बहुत प्यार जताती थी आज समय विपरीत हुआ तो उसके मुंह से ऐसे शब्दों के बाण चलते है कि कोई दुश्मन भी नही बोलता । राजू के मस्तिष्क में अब एक तस्वीर आई , विचारों का बादल झूमकर आया और जमकर बरसा । मन का सारा मैल धुल गया। राजू उठा और रसोई में गया। कुछ खाना बचा था, राजू ने खाया और वापिस छत पर जाकर सो गया ।

सुबह उठकर राजू ने स्नान किया और पिताजी से जाकर माफी मांगी और बोला कि मैं काम ढूंढने जा रहा हूँ और कोशिश करूंगा कि घर का जो भी नुकसान हुआ है धीरे धीरे वापिस भरपाई करूँ ।

घर से निकलते वक्त राजू सविता से नही मिला और निकल गया। सविता भी दुखी हो गई सोचा की कल रात को कुछ ज्यादा कह दिया तो नाराज हो गए , कहीं दुखी होकर कुछ गलत न कर बैठे। सविता रोती हुई पिताजी के पास गई और सारी बात बताई । पिताजी ने सविता को चुप कराया और कहा बहु तुमने कोई गलत नही किया और में जानता हूं कि राजू कभी गलत कदम नही उठा सकता , वो समय उसका अच्छा नही था तो इतना बड़ा नुकसान हो गया। में तो क्या करता और कुछ दिखता नही था तो उसको डांट मारता हूं , हा वो मेरी बात पर इतना सोचता भी नहीं है कभी और अब देखना तूने उसे कहा है ना वो अब सुधरेगा और सब ठीक हो जाएगा ।

पिताजी और सविता का जो व्यवहार राजू के साथ था वो इसलिए था कि राजू पहले नौकरी करता था , राजू के पिताजी भी गांव के प्रतिष्टित व्यक्ति थे, राजू कुछ पढ़ा लिखा भी था । अपने दोस्त के साथ मिलकर राजू ने व्यवसाय खोलने की इजाजत पिताजी से ली। आज तक राजू ने कभी गलती नही की थी तो पिताजी ने इजाजत और पूंजी दोनो दे दी। कुछ समय मे मुनाफा नही हुआ तो राजु ने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए और मुनाफे के नए तरीकों से पिताजी को अवगत कराया । पिताजी ने जमीन गिरवी रखकर राजू को फिर पैसे दे दिए लेकिन फिर घाटा हो गया । राजू ने फिर सविता से बात की , व्यवसाय को फिर से खड़ा करने के लिए राजू ने सविता की रजामंदी से गहने बेच दिए, लेकिन राजू की किस्मत का सितारा नही चमका और काम नही चला ।

दरअसल राजू ने बिना जानकारी के दोस्त की बातों में आकर काम तो चालू कर लिया लेकिन बाजारीकरण के ज्ञान के बिना व्यवसाय चौपट हो गया। घर की जमा पूंजी और सविता के गहने भी चले गए । यहां तक कि कर्जदार भी हो गए। तो राजू के पिताजी अक्सर दुखी होकर राजू को डांट मारते । लेकिन राजू कभी प्रत्युत्तर नहीं देता था । उस रोज जब सविता ने राजू को कड़वे शब्दों का भोग लगाया तो राजू की अंतरात्मा में सागर की सी लहरे उठी और झूझता हुआ राजू जब विचारों के किनारे पर आया तो निष्कर्ष निकला । राजू ने सविता के कड़वे शब्दो को प्रेरणा बनाया और निकल पड़ा फिर से कृतसंकल्पित होकर की कामयाब तो होना ही है।

यह संसार उसी की इज्जत करता है जो कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ चुका हो। प्रेरणा कई तरह की होती है । व्यक्ति चाहे तो हर पल हर बात से प्रेरित हो सकता है । बस समझने वाली अंतरआत्मा जागृत होनी चाहिए।

इधर सविता दुखी रहने लगी । आवेश में आकर राजू को शब्दों का कड़वा रस तो पिला दिया पर अब उसको सुकून नही मिल रहा था। सारा दिन काम करती और शाम के समय खाना नही भाता था। याद तो आनी ही थी आखिर उसका सुहाग था राजू । उधर राजू अब काम मे दिल और दिमाग दोनो लगा रहा था। वो अब सब कुछ भूल गया था बस उसे कुछ याद था तो सविता के वो शब्द जो तीर की भांति हरदम चुभते रहते थे। लेकिन वो चुभन ही राजू को आगे बढ़ने में सहायक थी।

राजू ने एक सेठजी के पास अर्धवेतन ( आधे दिन काम और आधा वेतन) की नौकरी पकड़ी और बाकी समय खुद के डूबे हुए व्यवसाय को सवांरने में लगा रहता । राजू काम से आते ही खुदरा व्यापारियों के पास जाता और अपना उत्पाद दिखाता।

एक साल बीत गया राजू अब बाजारीकरण का अर्थ समझने लगा और व्यापारियों से जान पहचान बढ़ाने लगा। राजू ने पिताजी के नाम खत लिखा , अपनी कुशल-क्षेम और काम का बताया। खत पढ़कर पिताजी को सुकून मिला कि काम तो मिल गया और कर्ज भी चुक जाएगा।लेकिन सविता रोज राजू के बारे में सोचकर परेशान रहने लगी। खत में भी राजू ने सविता के बारे में कुछ नही लिखा था।

इधर राजू के पांव धीरे धीरे बाजार में जम रहे थे । बहुत से खुदरा व्यापारी राजू को नई तकनीक की सलाह और जानकारी देते थे। राजू का व्यवहार और बोली का मीठापन हर किसी को भाता था। इस कारण राजू बाजार में प्रसिद्ध होने लगा। समय अपनी रफ्तार से चलता गया। और राजू भी बाजार में जमता गया।

जैसे कड़वे करेले का रस बहुत सी व्याधियों को दूर करता है वैसे ही राजू के लिए सविता के वो शब्द करेले का रस बने जो वास्तव में राजू के लिए जीवन औषधी थे। वो राजू जो तानो से दुखी होकर आत्महत्या करने जा रहा था अब कामयाबी की सीढियां दिन प्रतिदिन चढ़ रहा था।

हालांकि सविता बहुत दुखी रहने लगी और धीरे धीरे बीमार पड़ने लगी।

3 साल बीत गए वो राजू जिसको उसकी पत्नी ने अपने कमरे से बाहर यह कहकर निकाल दिया कि तेरे साथ से मेरा जीवन बर्बाद हो गया, अब राजवीर बनकर मशहूर व्यापारी था। और वो सविता जो कभी गौरी चिट्टी बलिष्ठ, यौवन से भरपूर थी आज अपने राजू के बारे में सोच-सोच कर सूख कर कांटा बन गई।

राजू के पिताजी ने राजू को खत लिखा और सब कुछ बताया।

राजू ने जवाबी खत लिखा और कहा कि राम का वनवास पूरा हो गया है मैं घर आ रहा हूँ लेकिन सविता को मत बताना।

राजवीर सिंह (राजू) की फ़ैक्टरि में 100 मजदूर काम करते थे और जितना नुकसान राजू ने किया था वो 3 साल में कमा चुका था। सबसे पहले राजू ने पिताजी की वो रकम अलग की फिर सविता के गहने बनवाये। मां पिताजी और सवीता के लिए कपड़े लिए और सूटकेस में सजाकर चला घर की तरफ।

जैसे राम लंका नगरी जीतकर पुष्पक विमान से अयोध्या की तरफ प्रस्थान कर रहे हो। राजू का सीना फूला हुआ था। बस उसे सिर्फ इस बात की चिंता थी कि सविता के साथ उसने गलत बर्ताव किया जो 3 साल तक कुशल क्षेम भी नही पूछी। लेकिन अगले ही पल उसने सोचा कि इस दौरान अगर सविता से बात करता तो शायद वो प्रेरणा कुछ अलग रूप ले लेती।

उधेड़बुन में उलझा हुआ राजू गांव पहुंच गया। घर पहुंचा तो पिताजी चारपाई पर बैठे थे पास में बूढ़ी माँ ।

राजू को देखकर वृद्ध पिता के उदासीन चेहरे पर खुशी की लकीर बनी। जैसे मरुस्थल में बादल घिर आये हो। पिताजी ने खड़े होने की चेष्ठा की तो राजू ने रोका , चरण स्पर्श किये पिताजी ने गले से लगा लिया और आंखों से अश्रुधारा फुट पड़ी। पास बैठी माँ भी रोने लगी तो राजू ने प्यार से माँ को भी गले लगाया और बातों में उलझा कर दर्द को कम किया। पांच सात मिनट इधर उधर की बात करके मां पिताजी का जी हल्का होने के बाद राजू ने कहा कि माँ सविता कहाँ है।

तेरे कमरे में है बेटा जा सम्भाल उसको भी, इन बूढ़ी हड्डियों में अब वो जान बाकी नहीं है। और वो पगली देख क्या हालत कर रखी है उसने। आज चार दिन से तो खाना भी नही खाया है। वैध जी बोलकर गए है कि खाना नही खाओगी तो ज्यादा बीमार हो जाओगी।

माँ तू रुक यहीं उसका इलाज मेरे पास है। कहकर राजू सीधा रसोई में गया , सुटकेश को दीवार के सहारे रखकर चूल्हा जलाया, और सविता के लिए खाना बनाने लगा।

राजू में माँ पिताजी के लिए खाना बनाकर उनको खिलाया फिर थाली में सविता के लिए खाना सजाया और कमरे में गया।

अचानक इस आगमन पर सविता चौंक उठी , वह स्तब्ध हो गई । उठना चाह रही थी मगर उठ ना सकी। उसकी इस हालत पर अंदर से राजू भी रो उठा लेकिन राजू ने आँशुओ को बाहर नही आने दिया। अंदर ही तड़प कर राह गया। राजू बिस्तर पर सविता के पास बैठ गया।। सविता कुछ बोल नही पा रही थी, बस एकटक राजू को देख रही थी। सविता की आंखों से दुख और पश्चाताप के आँशुओ का झरना बह रहा था। राजू में उसकी आंखें पोंछी और सविता से कहा , मेरी स्विटू चल खाना खा । राजू का भी गला भर गया था।

लेकिन जब खाने की खुश्बू सविता के नाक में गई तो वो चौंक गईं , उसकी पसंदीदा पालक पनीर जो राजू की माताजी को बनानी ही नही आती थी। भरे हुए गले से सविता ने राजू से पूछा 'खाना आपने बनाया है! राजू ने सिर्फ हा में सिर हिलाया । वो बोल नही सका , सविता राजू के गले से लिपट गई जैसे कोई लता अवलम्ब से लिपट कर जीवन्त होती है। सविता भी राजू के गले लगते ही मानो उसकी बीमारी दूर हो गईं। वह फुट फुट कर रोने लगी और बोली मुझे माफ़ कर दीजिए मेने आपका दिल दुखाया ।

राजू की आंखे भी गंगाजल बहा रही थी, शांत होकर राजू ने कहा चुप हो पगली खाना खा पहले ,, दो दिन से में भी भूखा हु। अब राजू सविता को और सविता राजू को कौर देने लगे , दोनो की आंखों से एक दूसरे के प्रति प्रेम और जिमेदारी का अहसास कराने वाले आँशु निकल रहे थे। बाहर से राजू की माँ भी यह दृश्य देखकर खुशी के आँशु बहा रही थी।

सविता के उन शब्दों ने राजू को इस कदर प्रेरित किया कि आज राजू अपने गांव का सबसे कामयाब व्यक्ति है।

(नाम बदला हुआ है)


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