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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

रसगुल्ले

सुशील शर्मा

गोल गोल सुंदर रसगुल्ले मुझ को लगते प्यारे हैं। मम्मी मुझको एक खिला दो देखो कितने सारे हैं। कितने मधुर रसीले मीठे मुँह में पानी आता है। जब भी इन पर नजर पड़ी खाने को मन हो जाता है। डूबे हुए चासनी में ये माँ तेरे जैसे लगते हैं। इनको माँ तू मुझको दे दे ये मेरे मुँह में फबते हैं। टिफिन में माँ रसगुल्ले रखदे , लंच नहीं ले जाऊँगा। सब मित्रों के संग बाँट कर रसगुल्ले मैं खाऊँगा।


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