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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



मैं ही मैं हूँ


सुशील शर्मा


मुझ से श्रेष्ठ कोई नहीं
मेरी बुद्धि सोई नहीं।
सब से अच्छा में लिखता हूँ
हर पेपर में खूब छपता हूँ।
मेरे चमचे वाह वाह करते।
मुझसे वो सारे हैं डरते।
दूसरे मेरी नजर में चुभते
मेरे रिश्ते किसी से नही निभते।
आलोचना मुझको नही पचती।
किसी की रचना मुझे नही जंचती।
हर दिन एक सम्मान चाहिए।
मेरा मुझे गुणगान चाहिए।
लोग कहते है मैं बच्चों सा लिखता हूँ।
अरे मैं उन जैसा ही दिखता हूँ।
साठ समूहों का सदस्य हूँ।
लड़ता सबसे मैं अवश्य हूँ।
जो भी मेरा प्रतिकार करेगा।
वो मेरे शब्दों से मरेगा।
उटपटांग में गाली दूंगा।
समूह में नहीं रहने दूंगा।
हिंदी साहित्य का हूँ मैं नगीना।
मेरी कविताएं छुड़वाए पसीना।
हर दिन दस कविता लिखता हूँ।
बगलोली उन में करता हूँ।
हिंदी का ह नही जानता।
बात कभी मैं नही मानता।
सम्मानों का मैं भूखा हूँ।
स्वभाव से मैं रूखा हूँ।
आखिर मैं तुम खैर मनाओ।
मेरे रास्ते से हट जाओ।
नियम कभी मैं न मानूँगा।
बस मैं अपनी ही ठानूँगा।
सब बुड़बक हैं मेरे आगे
मेरा काटा पानी न मांगे।
 

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