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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



मज़हबी शहीद की चाह


महेश द्विवेदी


मुझे नहीं चाहिये मय का दरिया
और नहीं चाहिये सत्तर हूरें
तुम बस उस शिशु से मिलवा दो
जिसकी आंखें हैं आज भी घूरें
 
मैं जब छोटा था, किशोर था
दूध के दांत नहीं टूटे थे पूरे
कठमुल्ला ने तब उल्लू बनाया
और कहा- जन्नत जाना है छोरे?
 
मय के दरिया का देकर लालच
दिखाये थे सब्ज़बाग हूरों के
बहक गया मैं कच्ची उमर में
हाथ थाम ली फ़ोर्टीसेविन ए. के.
 
काफ़िरों को मैंने चुन-चुन मारा
और कुछ ईमां वाले भी थे भूने
रहम करना किसी पर गुनाह था
जहां में ईमां लाने की जिहाद में
 
खड़ा हुआ था ग़ुस्से में एक दिन
इक नन्हें शिशु पर राइफ़िल ताने
भौचक्का वह मुझे देख रहा था
बहुत डरी हुई थीं वे भोली आंखें
 
कुछ ऐसा था उन मासूम आंखों में
कि रहम घुस रहा था मेरे मन में
तभी अपनी तालीम याद आ गयी
और दाग दिये बुलेट सब सीने में
 
तब से मेरे दिन और रातों में
वे आंखें नहीं हैं मेरा पीछा छोड़ें
मासूम आंखों में छाया गहरा डर
हरदम इक सवाल है मुझसे पूछे
 
“मैं भी औलाद उस परवरदिगार की
जिसे तुम और तुम्हारा मुल्ला पूजे
क्या सचमुच खुश होगा ऊपर वाला
देख मेरे ख़ूं से तेरे ये हाथ रंगे से?” 
 
मुझे नहीं चाहिये मय का दरिया,
और नहीं चाहिये सत्तर हूरें
तुम बस उस शिशु से मिलवा दो,
जिसकी आंखें हैं आज भी घूरें

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