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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



स्वतंत्रता


गंगाशरण शर्मा


करके सतत संघर्ष, 
संवारा सहेजा उसे।
सृजन शक्ति पाई
कर सुरक्षा उसकी।
क्रांति ही श्री ......
वह मेरी स्वतंत्रता।।
नहीं थी वह,
उत्तरदायित्वहीन । 
न थी उसमें 
वैचारिक जड़ता।
अपने निर्णय के प्रति,
सबक सिखाती स्वतंत्रता ।।
जाने-अनजाने रचती ,
जीवन के यथार्थ।
जिंदगी दौड़ी उसी राह,
जिधर दिखी स्वतंत्रता।
सहेजे संभाले संकल्पों के,
कई रूपों में मेरी स्वतंत्रता।।

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