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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



कौड़ियां


ध्रुव सिंह


हाथों में क़िस्मत लिखी थी 
बस लिखी सी रह गई 
माथे पर थी कुछ उभरती 
पसीनों में शेष बह गई 

सोचता था लिख दूँ क़िस्मत 
कुछ सही मेहनत से मैं 
मोल थीं वो कौड़ियों के 
अश्रु संग जो बह गईं 

बन पथिक कोसों चला था 
नग्न पाँवों से धूप में 
पाषाण की राहें हैं चुभतीं 
पीड़ा बन जो घुल गईं 

निहार कर मैं दूर देखूँ 
तनिक सही आँखों को सेंकूँ 
प्लवन करतीं संदेह भारी 
उदासियों में रम गईं 

मोल थीं वो कौड़ियों के 
अश्रु संग जो बह गईं 

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