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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



कर्मपथ


डॉ. अश्वनी कुमार वर्मा


तुम चलते ही चलना ‘अश्वनी’,
की मंजिल तो अभी बाकी है!
पत्थर से टकराना या पानी में चलना,
पहाड़ पर चढ़ना या घाटी में उतरना
तुम्हे तो बस चलते है रहना 
की मंजिल तो अभी बाकी है!

अभी पतझड़ है और लू के थपेड़े हैं 
तेज धूप है, और बदन पर पसीना है!
ये ऋतू बदलेगी, फिर सावन बरसेगा,
तुम चलते ही चलना,
की मंजिल तो अभी बाकी है!

ये ठंडी हवा जो छु कर चली गई,
ये नीम की छाँव जो पीछे रह गई 
इनसे संग का कभी वादा भी न था!
तुम चलते ही चलना,
की मंजिल तो अभी बाकी है!

अरे, ये मंजिल पथ पर कोन राही मिला,
कुछ दूर चला और फिर लौट गया!
तुम ना खुश होना, तुम ना दुखी होना,
तुम्हे तो बस चलते है जाना,
तुम चलते ही चलना,
की मंजिल तो अभी बाकी है!

अंधेरी रात है और जंगल सुनसान है,
राह भी भटका है और गला भी सूखा है!
फिर सूरज उगेगा, फिर पंछी चहचायेंगे,
ओस की बूंदे गिरेंगी, फिर उम्मीदें जगेंगी,
तुम ना घबराना, तुम ना थामना,
तुम चुने हुए पथ पर ही चलना,
की मंजिल तो अभी बाकी है!

अभी धड़कन तेज है और सांस फूली है,
होठों पर थरथराहट, और नसें फूली हैं!
समय करवट लेगा,मंजिल नजदीक आएगी,
तुम न थकाना, तुम ना रुकना,					
कर्मपथ पर बढ़ते ही जाना,						
तुम चलते ही चलना ‘अश्वनी’,					
की मंजिल तो अभी बाकी है!				

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