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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



ढल गयी है


अच्युतम केशवम


ढल गयी है
साँझ
दिन का थका हलवाहा
सोना चाहता है
भूल उस अल्हड़ किरण को
जिसने
भोर में
गुदगुदा उसको जगाया
और वह
श्यामल सलोनी छांह
कसमसाती सी
कुएं के जगत वाली
जिसकी ओढ़नी को शीश पर धर
तप्त दोपहरी की उस तीखी लपट में भी
वह
तनिक सा मुस्कराया
अब
काली निशा में
उर्वर बीज सपनों के
जो अँकुआ उठेंगे
कल उषा अनुरागिनी का
स्पर्श पाकर
शांत और चुपचाप
बोना चाहता है
ढल गयी है   		 
 

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