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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



ऐसे हालात में कविता


रंजीत कुमार


मेंढक छलांग लगा सकते थे 
और सांप को रेंगना आता था 
मैंने देखा- छलांग छोटी पड़ गयी सांप की विषैली दांत के सामने 
खरगोश बहुत तेज दौड़ रहा था 
और कुत्‍ता हांफ रहा था 
मैंने देखा- खरगोश की दौड़ छोटी पड़ गयी कुत्‍ते के नुकीले पंजों के सामने 
फतींगे उड़ सकते थे 
और छिपकली सरकना ही जानता था 
मैंने देखा- फतींगे की उड़ान छोटी पड़ गयी छिपकली की लसलसी जीभ के सामने
हालात ऐसे ही हो चले थे हमारे आसपास 
और ऐसे हालात में मैं कोई कविता पढ़ना चाहता था
पढ़ न सका 
ऐसे हालात में मैं कोई कविता लिखना चाहता था 
लिख न सका 
ऐसे हालात में मैं थोड़ा कवि होना चाहता था 
हो न सका 
मैंने जब-जब इस हालात को कोई नाम देना चाहा 
मेरे सामने विषैली दांत, नुकीले पंजे और लपलपाती जीभ आ गयी 
मैं हालात को विषैली दांत कैसे कह दूं ? 
और मैं देश को जंगल भी तो नहीं कह सकता, साथी

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