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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



सामयिक दोहे

सुशील यादव

 		 
पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप
विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप

महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश
लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास

संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग
अपनी ढपली बजा रहे ,खुद अपना राग

ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल
जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल

संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह
ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह

रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच
पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच

काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून
देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून

होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक
मन माफिक तो चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक

किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक
कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे  रंक

फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप
टाँग आपसी  खींचना, बन पंचायत खाप

चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट
हैरत  देके  खैरियत,पूछे कभी न चोट

रहने दो   हर बात को ,निजी आपसी तौर
कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और

दीमक बन के खा रही ,दीमागी  भूगोल
दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल

भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन
मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन
 

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