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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



*त्वं शरणं मम*


सुशील शर्मा


                                              
मन अंदर है गहन अंधेरा।
चारों ओर दुखों का घेरा।
जीवन की पथरीली राहें।
तेरे चरण हैं मृदुल सबेरा।
हे शैलपुत्री त्वं चरणं मम।
हे हिमपुत्री त्वं शरणं मम।

जन्म जन्म की यात्रा पर हूँ।
अधम कोटि का मैं पामर हूँ।
काम क्रोध मद लोभ ने घेरा।
मानव रूप धरे विषधर हूँ।
ब्रह्मचारिणी त्वं शरणं मम।
रूपधारणी त्वं चरणं मम।


मानव विकृति के पथ पर है।
चढ़ा हुआ अहम रथ पर है।
अंधाधुंध वह दौड़ रहा है।
दिशा हीन दुर्गम पथ पर है।
हे चंद्रघण्ठे त्वं चरणं मम।
हे मृदुकान्ता त्वं शरणं मम।


कन्या भ्रूण को लोग मारते।
फिर तेरी आरती उतारते।
नवरात्रि में पूजन करके।
तुझको वर देने पुकारते।
हे कुष्मांडे त्वं चरणं मम
हे ब्रम्हमांडे त्वं शरणं मम

शिक्षा अब व्यापार बनी है।
उच्छ्रंखल व्यवहार बनी है।
बच्चे सब मशीन है जैसे
धन कुबेर की शिकार बनी है।
स्कंदमाते त्वं चरणं मम।
जीवन दाते त्वं शरणं मम।

एक भी बचा नही है जंगल
नेताओं का हो रहा मंगल।
पर्यावरण प्रदूषित सारा।
सारे देश में मचा है दंगल।
हे कात्यायनी त्वं चरणं मम।
हे हंसवाहनी त्वं शरणं मम।

कष्ट कंटकों से घिरा है मानव।
धन,सत्ता,बल बने हैं दानव।
सरकारें सब सो रही हैं।
टैक्स लग रहे सब नित अभिनव।
हे कालरात्रि त्वं चरणं मम।
हे महारात्रि त्वं शरणं मम।

अपने सब हो गए बेगाने।
आभासी चेहरे दीवाने।
आसपड़ोस सब सूने हो गए।
सब रिश्ते रूखे अनजाने।
महागौरी त्वं चरणं मम।
सिंहवाहनी त्वं शरणं मम।

विपदा विकट पड़ी है माता।
सुत संकट में तुझे बुलाता।
कोई नही है इस दुनिया में।
तेरे सम सुख शरणम दाता।
हे सिद्धिदात्री त्वं चरणं मम।
हे सर्वशक्ति त्वं शरणं मम।

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