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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



हाँ , मैं प्यार करता हूँ


सुशांत सुप्रिय


                                              
ओ प्रिये

मैं तुम्हारी आँखों में बसे
दूर कहीं के
गुमसुम खोयेपन से
प्यार करता हूँ

मैं घाव पर पड़ी
पपड़ी-सी
तुम्हारी उदास मुस्कान से
प्यार करता हूँ

मैं उन लमहों से प्यार करता हूँ
जब बंद कमरे की खुली खिड़की से
हम दोनो इकट्ठे-अकेले
अपने हिस्से का आकाश नाप रहे होते हैं

हाँ , मैं उन अनाम पलों से भी
प्यार करता हूँ जब
तुम्हारे अंक में अपना मुँह छिपाए
ख़ालीपन से ग्रस्त मैं
किसी अबूझ लिपि के
टूटे हुए अक्षर-सा
बिखरता महसूस करता हूँ
जबकि तुम
नहींपन के किनारों में उलझी हुई
यहीं कहीं की होते हुए भी
कहीं नहीं की लगती हो

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