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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



मनमानी राह ले बैठा


हरिहर झा


 
किसी और की क्या है गलती       
मनमानी राह ले  बैठा।    
   
गलत सलत परिधान ले लिये,     
पहन लिये विदूषक जैसे      
काऊबॉय सा कभी लगे तो,       
कभी कोई   फटीचर जैसे      
दाग लग गये सब वस्त्रों में,     
कम ना थे अपने भी लफड़े    
धोबन उजले धोती थी पर      
फाड़ गई कुचेले कपड़े 
      
जगह जगह पैबन्द लगे हैं, 
खोल रहे है कच्चा चिट्ठा     
किसी और की क्या है गलती       
मनमानी राह ले  बैठा।     
  
छलक रही थी उर्जा भीतर      
खुशियों से भरपूर   खजाना     
गरूर मन का उबल पड़ा तो     
अपनो को ही किया बेगाना
    
सोंचा था दिल की धड़कन पर     
अपना ही राग सुनायेगे    
जाम भरेगी साकी हम तो       
चियर्स कहते बतियायेगें    

नैनो में मधुशाला थी पर      
चिढ़ कर दिखा गई अंगूठा    
किसी और की क्या है गलती      
मनमानी  राह ले  बैठा।  

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