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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



लक्ष्मण रेखा


ध्रुव सिंह "एकलव्य''


 
जो खींच दिया है
तूने
जनता है
बौराई
बाँधी सत्य की
सीमा तूने
माया क्रीड़ा
रचाई

कहकर
लक्ष्मण रेखा
है,यह
लांग न तूँ
हरजाई

कसम है ! तुझको
इस माटी की
इसमें कसम
मिलाई

जो खींच दिया है
तूने
जनता है
बौराई

प्रयत्न किया है
रचने को मैं
षड़यंत्र,
पूर्णनियोजित
भाई
पटाक्षेप न करो !
तूं मिलके
जमने दे ! मन पर
काई

जो खींच दिया है
तूने
जनता है
बौराई

पेट हमारा
चलता है
ग्राहक तूं
मैं हलवाई
बासी को मैं
नया बनाऊँ
भ्रम की दुकान
चलाई

पाँच साल अब
आने दे !
फिर पकवान
बनाई
थोड़े दिन की बात है
प्यारे
फिर तेरी थाली
खाई !

बचके ! ना जा पाएगा
मुझसे
तूं मुर्गा,मैं
कसाई
दाना चंद
खिलाऊँगा !
फिर से जाल
बिछाई

जो खींच दिया है
तूने
जनता है
बौराई

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