Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



मैं यहाँ का, वह वहाँ का


अमरेन्द्र सुमन


आदिवासी-गैर आदिवासी की 
धार में बहते जाईये
मैं यहाँ का, वह वहाँ का
जुमला सुनते जाईये

इस बहस में थम चुकी है
आदमी की चाल यहाँ
वे विकास की बातें कर रहे
पहन आरक्षण की ढाल यहाँ

मैं यहाँ का, वह वहाँ का 
शोर सुनते जाईये
कौन है अपना, कौन पराया
रुक-रुक कर समझाईये

जिनके पेट की आँतें सूख रही
उनकी बातें गौन रही
चुल्हों पर मौजूद तावा, फिर भी
चकले पर रोटी मौन रही

चैक-चैराहों पर नप रही
आदमी की औकात यहाँ
धर्म, जाति-मजहब की बातें
बँट रही सौगात यहाँ

कौन है अपना, कौन पराया
शोर सुनते जाईये
गली-मुहल्लों, चैक-चैराहों की
आवाज बनते जाईये
 

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें