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वर्ष: 2, अंक 25, नवम्बर(द्वितीय), 2017



सही-गलत


रामेश्वर मिश्र


 
जो विपरित थपेड़ों से भिड़कर
हरा उन्हें, जीतकर चली आ रहीं
अब तुम बतलाओगे उनको?
कि क्या करना सही-गलत है

जो जकड़ी गई बंद दिवारों मे
सपने पलें झरोखे के उजालों मे
क्यों जलते हो भीतर से, उड़ने दो
अब तो बनी सुर्खियां वेअखबारों के

जिसने लोक-रिवाजों से लड़कर
धरती से नभ तक ध्वज लहराये
अब भी तुम बतलाते ही उनको?
कि क्या करना सही -गलत है

उनकी क्षमता को मत आँको
अपनी कुण्ठाओं को तुम फाँकों
रचना बंद करो तुम षडयंत्र
ज्ञात उन्हें सब दुनियादारी
कि क्या करना सही गलत है

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