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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



ग़ज़ल -
मुझसे रूठे कब तलक यूँ ही रहोगे


प्राण शर्मा


 
मुझसे रूठे कब तलक यूँ ही रहोगे 
ज़िद पे अपनी तुम कहो कब तक अड़ोगे 

अपनी खुशियों से भी तुम जाते लगोगे 
औरों की खुशियों से गर जलते रहोगे 

मुझसे रूठे हो तो रूठे ही रहो तुम 
ख़ुद से रूठे कब तलक लेकिन रहोगे 

मुददतों के बाद तुम मुझसे मिले हो 
गर गले से अब नहीं तो कब मिलोगे 

डींगें दुनिया में बहुत हमने सूनी हैं 
देख  लेंगे जब हवा में तुम उड़ोगे 

चढ़ नहीं पाए कुतुबमीनार तुम तो 
एक ऊँची सी पहाड़ी क्या चढ़ोगे 

लो नसीयत तुम किसी अच्छे बशर की 
गर फलोगे तो नसीयत से फलोगे 

जब किसीसे भी मिलो झुक कर मिलो तुम 
बच्चे क्या बूढ़ों को भी अच्छे लगोगे 



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