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वर्ष: 2, अंक 29,  जनवरी(द्वितीय), 2018



पुतले का दर्द


सुनीता त्यागी


मेले में तरह-तरह के सामानों से सजी हुई दुकानों को देख कर बच्चे और बड़े आनन्दित हो रहे थे।

वहीं एक स्टॉल के सामने रखे पुतले को देख कर चलते चलते रुक कर उसे देख रहे थे। और बोल उठते थेे " कितना सजीव लग रहा है। बनाने वाले ने भी कमाल ही कर दिया।

वहां से गुजरते एक परिवार का बच्चा भी आश्चर्यचकित होकर बोल उठा " एकदम जिन्दा आदमी लग रहा है "।

तभी दूसरा बोला " अरे आदमी नहीं है पुतला है, बिजली से चल रहा है। जैसे वो जन्माष्टमी की झांकियों में पुतले हिलते डुलते हैं ना, वैसा ही।

" पर देख!! कैसी पलकें झपक रहा है "।

तभी छोटी बच्ची बोल उठी हां भैया! जैसे मेरी गुड़िया झपकाती है , और रोती भी है "।

" हां पर है तो ये पुतला ही "।

बच्चे एक दूसरे को तर्क दे रहे थे पर मन में सभी के सच जानने की जिज्ञासा बनी हुई थी। इसी लिये बड़े वाले बच्चे ने दुकानदार की नजरों से बच कर पुतले को चिकोटी काट ली, दूसरे ने चुपके से एक सींक उठा कर चुभा दी उसे ।

लेकिन पुतला फिर भी न हिला न डुला, सारे दर्द को चुपचाप सहता रहा। बस अपने आंसू पी कर सोचता रहा " कैसे बताऊं तुम्हें कि हां मैं एक पुतला नहीं,तुम्हारी ही तरह जीता जागता इंसान हूं। पर शाम को इसी काम से मिलने वाले रुपयों से मेरे घर का चूल्हा जलता है।


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