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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



क्यों बस जीवन ही शेष रहा


विमल शुक्ला



क्या डरना है मरने से
डरना है तो डर जीकर भी
कुछ भी न करने से
करना ही जीना है 
ना करना मरना है
करना जीवित सा है करना
बाकी सब मरना है
अंदर जीने वाला मृत है 
बाहर जीवित केवल वेश रहा
क्यों बस जीवन ही शेष रहा..

जी जी कर मरना
मरमर कर जीना क्या जीना
किस क्षण ने जीवन का
उन्नत  बल है तुमसे छीना
किसका आना अपरिहार्य
किसकी स्वीकृति अप्राप्त अभी
कैसे बस मृत्य और अवनति
से तृप्त तुक्ष अधिशेष रहा,
क्यों बस जीवन ही  शेष रहा..

कैसा सबकुछ था जुड़ा हुआ
कैसा सबकुछ टूटा सा है..
अब आगे क्या क्या जोड़ो या तोड़ोगे
या फिर छोड़ोगे
कुछ नही करोगे या फिर तुम
वो भी कैसे कर पाओगे..
था सीमित सुख का अन्वेषण 
पर भीतर भारी क्लेश रहा,
क्यों बस जीवन ही शेष रहा..

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