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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



तुम प्रेम में हो


सुशील शर्मा



जब तुम्हारी आंखे
बिन बोले ही सब कहने लगें।
जब तुम्हारी बातें
तुम्हारी समझ से बाहर हों।
तो समझना तुम प्रेम में हो।

जब तुम्हारे शब्द
मौन का लिबास ओढ़ लें
और तुम्हारे आंसू
बगैर तुम्हारी इज़ाज़त के
गालों पर लुढकें तो
समझना प्रेम तुम्हारे अंदर
प्रस्फुटन के लिए तैयार है।

जब आसपास सब अधूरा लगे
और फूल से बात करने का मन हो।
जब डायरी के पेज पर 
लिख कर भी कुछ न लिख पाओ।
जब सब अजनबी लगने लगें और
खुद से बात करने लगो तो
समझना कि प्रेम ऊग चुका है।

जब सभी रिश्तों से आंखे
चुराकर मन रोने को हो
और मंदिर में जाकर आंख बंद
करने पर उसकी छवि दिखे।
जब उसके नाम पर दिल निकल
कर हलक में अड़ जाए।
तो समझना प्रेम में पग चुके हो।

जब उससे मिलने में डर लगे
और बिछड़ने में रोना आये
जब उसकी हर बात में खुद 
को प्रतिबिंबित करो।
जब मन के हर कोने में उसकी
हर सफलता के लिए प्रार्थना हो
उसके दुख के कांटे 
जब तुम्हारे हृदय में चुभें
तो समझना तुम प्रेम में बह रहे हो।


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