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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



मेरी प्यारी माँ


सुनील चौरसिया 'सावन'



मेरी प्यारी माँ
धरती से बड़ी हैं
छोटा है आसमाँ
मेरी प्यारी माँ

जाऊँ मैं कहीं भी
जाऊँ मैं कभी भी
बना देती हैं रोटी
गरम स्वादिष्ट सब्जी  संग
 पूड़ी छोटी-छोटी

छोङने से पूर्व गाँव
छूता हूँ भाव से पाँव
छूकर स्नेह से शीश
देती हैं आशीश

खूब पढो, आगे बढो
पूरा हो अरमाँ
मेरी प्यारी माँ
धरती से बङी हैं
छोटा है आसमाँ
मेरी प्यारी माँ

देखकर मुझे उदास,
हो जाती हैं हताश
पूछती हैं आकर पास- 
"बेटा ! क्यों हो निराश?"
मैं हूँ न तेरे साथ 
रखो खुद पर विश्वास

जीत हो या हार, 
रहो हरदम तैयार
तुम्हें फूलों का हार, 
पहनाएगा संसार
संसार है परिवार, 
करो सबसे तुम प्यार

हो हिन्दू या मुसलमाँ
मेरी प्यारी माँ
धरती से बङी हैं
छोटा है आसमाँ
मेरी प्यारी माँ

कष्टों को हँसकर सहती हैं 
और मुझसे कहती हैं-
"धूल-मिट्टी से खेलो ,
कष्टों को हँसकर झेलो

खिला हुआ पुष्प भी सहता
वर्षा- धूप- तूफाँ.......
मेरी प्यारी माँ
धरती से बङी हैं
छोटा है आसमाँ
मेरी प्यारी माँ

सुनो बेटा सुनिल ! 
है कुछ भी नहीं मुश्किल
उर्वर बनाओ या रेत, 
है खेत दिमाग-दिल
जब शुद्ध सोच से सिंचोगे 
तब खिलेगा फूल
जब भूल जाओगे सद्कर्म 
तब उङेगी धूल
सद्कर्म करो, सोचो मत
"क्या कहेंगे लोग"
लोगों को लगा है बस 
बहकाने का रोग

देश-हित में जियो-मरो,
तुम हो वीर जवाँ.....
मेरी प्यारी माँ
धरती से बङी हैं
छोटा है आसमाँ
मेरी प्यारी माँ

छोङ दो बहानेबाजी,
वर्ना लोग कहेंगे पाजी
काम कठिन हो या सरल,
करने को होजा राजी
तुम गरीब, मैं गरीब,
गरीब थे लिंकन
पन्द्रह बार हारकर
चूम लिये गगन

ना ! ना ! करना छोङ दो,
दिल में बसालो "हाँ" !...
मेरी प्यारी माँ
धरती से बङी हैं
छोटा है आसमाँ
मेरी प्यारी माँ।

       

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