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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



स्त्री


सौरभ श्रीमान




स्त्री ही जननी होती है
है उसने ये संसार जना
फिर क्यूँ ये यहाँ फैली है प्रथा
है उसका ही सत्कार मना

कितने तुम पर बरसाये
हैं उसने तुम उपकार सुनो
ना भूलो उसकी निश्छलता
उसकी बातें हर बार सुनों

एक स्त्री ही माँ होती है
ज़रा याद करो उसकी ममता
प्रत्येक भाव से प्रेम करे
मैं मूक, ना वर्णन की क्षमता

स्त्री ही तुम्हारी बहना है
इस बंधन का क्या कहना है
नित नए मित्र बना लो तुम
पर श्रेष्ठ उसी को रहना है

स्त्री ही तुम्हारी प्रेयसी है
व्यावहारिक जीवन की शिक्षक है
स्वाभिमान का वो बलिदान करे
तेरे आत्मसम्मान की रक्षक है

स्त्री ही तुम्हरी मित्र भी है
जीवन महकाता इत्र भी है
जो मन के भीतर झांक सके
ऐसा कोई अन्यत्र भी है?

स्त्री ही तुम्हरा अर्ध-अंग
वो जीवन का आधार है
सुख-दुःख, आंसू, पीड़ा, क्रंदन
प्रति क्षण वो तैयार है

स्त्री का होना जीवन में
ये ईश्वर का वरदान है
हर रूप में प्रेम की देवी है
ये देवी बहुत महान है

कहलाओगे उतने सम्मानित
बस श्रद्धा से सम्मान करो
उसकी रक्षा में जीवन दो
चाहे देवी वो अनजान हो

आश्वाशन मेरा ले लो तुम
ममता के पौधे से पुष्प बन, खिल जाओगे
नवजीवन लेकर आओगे
फिर इसी प्रेम से मिल जाओगे


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